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Saturday, 22 June 2013

जो भारत को इंडिया कहते है वे मात्र लॉर्ड मैकाले के दिये वचनो का पालन कर रहे है इंडिया बोलने से पहले विचारे : क्या अर्थ है इंडिया का ? कुछ नहीं ... हर भारतीय के नाम का अर्थ है | हमारे यहाँ बिना भावार्थ के नाम रखने की असांस्कृतिक परंपरा नहीं है |

अंग्रेज़ो को भारत नाम बोलने मे परेशानी होती थी -अंग्रेज़ इंडियन उस व्यक्ति को कहते है जो उनके हिसाब से जाहिल माना जाता है, -अंग्रेज़ इंडियन उस व्यक्ति को कहते जो पाषाण कालीन जीवन जीता है Remember the old British notorious signboard 'Dogs and Indians not allowed'. लेकिन हमारे भारत नाम का अर्थ है भारत : भा = प्रकाश + रत = लीन ( हमेशा प्रकाश, ज्ञान मे लीन ) इतना महान अर्थ से परिपूर्ण देश का नाम है |

Friday, 21 June 2013

यह वही प्राचीन भूमि है, जहां दूसरे देशों को जाने से पहले तत्वज्ञान ने आकर अपनी वासभूमि बनायी थी। यह वही भारत है, जहां के आध्यात्मिक प्रवाह का स्थूल प्रतिरूप उसके बहने वाले समुद्राकार नद हैं, जहां चिरन्तन हिमालय श्रेणीबद्ध उठा हुआ अपने हिमशिखरों द्वारा मानों स्वर्गराज्य के रहस्यों की ओर निहार रहा है। यह वही भारत है, जिसकी भूमि पर संसार के सर्वश्रेष्ठ ऋषियों की चरणरज पड़ चुकी है। यहीं सबसे पहले मनुष्य-प्रकृति तथा अन्तर्जगत के रहस्योद्घाटन की जिज्ञासाओं के अंकुर उगे थे।
यह वही भारत है जो शताब्दियों के आघात, विदेशियों के शत-शत आक्रमण और सैकड़ों आचार-व्यवहारों के विपर्यय सहकर भी अक्षय बना हुआ है। यह वही भारत है जो अपने अविनाशी वीर्य और जीवन के साथ अब तक पर्वत से भी दृढ़तर भाव से खड़ा है। आत्मा जैसे अनादि, अनन्त और अमृतस्वरूप है, वैसे ही हमारी भारतभूमि का जीवन है। और हम इसी देश की सन्तान हैं।
भारत की सन्तानों, तुमसे आज मैं यहां कुछ व्यावहारिक बातें कहूंगा, और तुम्हें तुम्हारे पूर्व गौरव की याद दिलाने का उद्देश्य केवल इतना ही है। कितनी ही बार मुझसे कहा गया है कि अतीत की ओर नजर डालने से सिर्फ मन की अवनति ही होती है और इससे कोई फल नहीं होता, अत: हमें भविष्य की ओर दृष्टि रखनी चाहिए। यह सच है। परन्तु अतीत से ही भविष्य का निर्माण होता है। अत: जहां तक हो सके, अतीत की ओर देखो, पीछे जो चिरन्तन निर्झर बह रहा हैं, आकण्ड उसका जल पीओ और उसके बाद सामने देखो और भारत को उज्जवलतर, महत्तर और पहले से और भी ऊंचा उठाओ। हमारे पूर्वज महान थे। पहले यह बात हमें याद करनी होगी। हमें समझना होगा कि हम किन उपादानों से बने हैं, कौन सा खून हमारी नसों में बह रहा है। उस खून पर हमें विश्वास करना होगा। और अतीत के उसके कृतित्व पर भी, इस विश्वास और अतीत गौरव के ज्ञान से हम अवश्य एक ऐसे भारत की नींव डालेंगे, जो पहले से श्रेष्ठ होगा।
किसी भी दूसरे देश की अपेक्षा भारत की समस्याएं अधिक जटिल और गुरुतर हैं। जाति, धर्म, भाषा, शासन-प्रणाली-ये ही एक साथ मिलकर एक राष्ट्र की सृष्टि करते हैं। यदि एक-एक जाति को लेकर हमारे राष्ट्र से तुलना की जाए तो हम देखेंगे कि जिन उपादानों से संसार के दूसरे राष्ट्र संगठित हुए हैं, वे संख्या में यहां के उपादानों से कम हैं। यहां आये हैं, द्रविड़ हैं, तातार हैं, तुर्क हैं, मुगल हैं, यूरोपीय हैं- मानो संसार की सभी जातियां इस भूमि में अपना-अपना खून मिला रही हैं।
हमारी एकमात्र सम्मिलन-भूमि है-हमारी पवित्र परम्परा, हमारा धर्म। एकमात्र सामान्य आधार वही है, और उसी पर हमें संगठन करना होगा। यूरोप में राजनीतिक विचार ही राष्ट्रीय एकता का कारण है। किन्तु एशिया में राष्ट्रीय ऐक्य का आधार धर्म ही है, अत: भारत के भविष्य-संगठन की पहली शर्त के तौर पर उसी धार्मिक एकता की ही आवश्यकता है। देश भर में एक ही धर्म सबको स्वीकार करना होगा। एक ही धर्म से मेरा क्या मतलब है? यह उस तरह का एक ही धर्म नहीं, जिसका ईसाइयों, मुसलमानों या बौद्धों में प्रचार है। हम जानते हैं, हमारे विभिन्न सम्प्रदायों के सिद्धान्त तथा दावे चाहे कितने ही भिन्न क्यों न हों, हमारे धर्म में कुछ सिद्धान्त ऐसे हैं जो सभी सम्प्रदायों द्वारा मान्य हैं। इस तरह हमारे सम्प्रदायों के ऐसे कुछ सामान्य आधार अवश्य हैं। उनका स्वीकार करने पर हमारे धर्म में अद्भूत विविधता के लिए, गुंजाइश हो जाती है, और साथ ही विचार और अपनी रुचि के अनुसार जीवननिर्वाह के लिए हमें सम्पूर्ण स्वाधीनता प्राप्त हो जाती है। अत: हम देखते हैं कि एशिया में और विशेषत: भारत में जाति, भाषा, समाज-सम्बंधी सभी बाधाएं, धर्म की इस एकीकरण-शक्ति के सामने उड़ जाती हैं। हम जानते हैं कि भारतीय मन के लिए धार्मिक आदर्श से बड़ा और कुछ भी नहीं है। धर्म ही भारतीय जीवन का मूलमंत्र हैं, और हम केवल सबसे कम बाधा वाले मार्ग का अनुसरण करके ही कार्य में अग्रसर हो सकते हैं। यह केवल सत्य ही नहीं कि धार्मिक आदर्श यहां सबसे बड़ा आदर्श है, किन्तु भारत के लिए कार्य करने का एकमात्र सम्भाव्य उपाय यही है।
हमने देखा है कि हमारा धर्म ही हमारे तेज, हमारे बल, यही नहीं, हमारे राष्ट्रीय जीवन का भी मूल आधार है। इस समय मैं यह तर्क-वितर्क करने नहीं जा रहा हूं कि धर्म उचित है या नहीं, सही है या नहीं, और अन्त तक यह लाभदायक है या नहीं, किन्तु अच्छा हो या बूरा, धर्म ही हमारे राष्ट्रीय जीवन का प्राण है, तुम उससे निकल नहीं सकते। अभी और चिरकाल के लिए भी तुम्हें उसी का अवलम्ब ग्रहण करना होगा और तुम्हें उसी के आधार पर खड़ा होना होगा, चाहे तुम्हें इस पर उताना विश्वास हो या न हो, जो मुझे है। तुम इसी धर्म में बंधे हुए हो, और अगर तुम इसे छोड़ दो तो चूर-चूर हो जाओगे। वही हमारी जाति का जीवन है और उसे अवश्य ही सशक्त बनाना होगा। तुम जो युगों के धक्के सहकर भी अक्षय हो, इसका कारण केवल यहीं है कि धर्म के लिए तुमने बहुत कुछ प्रयत्न किया था, उस पर सब कुछ निछावर किया था। तुम्हारे पूर्वजों ने धर्म रक्षा के लिए सब कुछ साहसपूर्वक सहन किया था, मृत्यु को भी उन्होंने हृदय से लगाया था। विदेशी हमलावरों द्वारा मन्दिर के बाद मन्दिर तोड़े गए, परन्तु उस बाढ़ के वह जाने में देर नहीं हुई कि मन्दिर के कलश फिर खड़े हो गए। दक्षिण के ये ही कुछ पुराने मन्दिर और गुजरात के सोमनाथ के जैसे मन्दिर तुम्हें विपुल ज्ञान प्रदान करेंगे। वे जाति के इतिहास के भीतर वह गहरी अन्तदृष्टि देंगे, जो ढेरों पुस्तकों से भी नहीं मिल सकती। देखों कि किस तरह ये मन्दिर सैकड़ों आक्रमणों और सैकड़ों पुनरुत्थानों के चिह्न धारण किये हुए हैं, ये बार-बार नष्ट हुए अब पहले ही की तरह अटल रूप से खड़े हैं। इसलिए इस धर्म में ही हमारे राष्ट्र का मन है, हमारे राष्ट्र का जीवनप्रवाह है। इसका अनुसरण करोगे तो यह तुम्हें गौरव की ओर ले जाएगा। इसे छोड़ों तो मृत्यु ही एकमात्र परिणाम होगा और पूर्ण नाश ही एकमात्र परिणति। मेरे कहने का यह मतलब नहीं कि दूसरी चीज की आवश्यकता ही नहीं, मेरे कहने का यह अर्थ नहीं कि राजनीतिक या सामाजिक उन्नति अनावश्यक है, किन्तु मेरा तात्पर्य यही है और मैं तुम्हें सदा इसकी याद दिलाना चाहता हूं कि ये सब यहां गौण विषय हैं, मुख्य विषय धर्म है।

Thursday, 20 June 2013

आजतक जो इतिहास पढाया गया सब झूठा है | इतिहास में पढाया गया अकबर महान | महाराणा प्रताप महान नहीं ? शिवाजी महान नहीं ? महाराणा प्रताप पद भरष्ट देशभगत थे इसको कहने वाले इतिहासकार | हम उस इतिहास को नहीं मानते जिसमे महाराणा प्रताप महान नहीं | इस इतिहास को वो माने जो अकबर को महान कहते है | वो अकबर, ये इतिहास क्यों नहीं पढाया जाता की अकबर मीना बाज़ार लगवाता था आगरा में और मीना बाज़ार में खुद औरतो के वेश में जाता था और जो औरत पसंद आती थी उसे ले आता था | ये भी इतिहास है की बीकानेर की राजकुमारी किरण देवी उस मीना बाज़ार में आई थी और अकबर की दासिया उसे बहला फुसलाकर ले गयी और अकबर के सामने ले जाकर पहुची, उसने अकबर की बुर्नियत को देखा और बताते है की अकबर को गिराकर उसकी छाती पर छुरी लेकर चढ गयी और तब अकबर ने उसको बहिन बनाकर उससे माफ़ी मांगी | ये भी तो इतिहास है ये क्यों नहीं पढाया जाता ? ये क्यों नहीं पढाया जाता की अकबर ने तुलसीदास को क़ैद किया ? आजतक पढाते आये की कुतुबमीनार कुतुब्दीन एबक ने बनायीं | क्या खाक बनायीं | मीनार के सामने सरकार का शिलालेख लगा है की यह २४ मंदिरों को तोड़कर बनायीं | पता चला जब उसके निचे से मंदिरों की मुर्तिया निकली, पत्थर निकले | तब पता चलता है की असली इतिहास कौन है लेकिन इतिहासकार इस बात पर मौन है |


To opine on the policy of minorities, we must define who is minority in this nation. What has been the attitude of majority towards minorities in this nation is another important aspect of the subject.
In proper perspective, only those people, who had to take refuge in another nation because they were thrown out of their country by the invaders, can be called a minority. In this perspective, in Bharat, only Jews and Parsis can be termed as minorities in every sense. In the context of the above definition, Muslims and Christians, who are termed as minorities because of vote bank politics, can never be termed as minorities, because 99.99 % of them have not come from outside. Some generations back, due to the compulsions of situation, their forefathers, who were children of this very nation, changed their religion. In such situation, to call them minorities is in itself equivalent to promoting divisive politics.
Bharat is the only nation in the world, where in its original Hindu tradition; there are no compulsions in observance of religion. Every person is totally free to call God by the name of his choice, and worship him in his own preferred way. Because of this unique tradition, the Jews and Parsis who came here as refugees, never felt that they were aliens, and it is for this very reason that when they were offered special reservations for them in our Constitution, they not only refused it, but by their acts and deeds, proved that they have completely integrated themselves with the national mainstream.
This unique aspect of Hinduism is amply substantiated by many Supreme Court decisions.